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Nội dung text 10. संविधान राजनीतिक दर्शन.pdf

राजनीति तिज्ञान अध्याय-10: संविधान का राजवनविक दर्शन
(1) 10 संविधान का राजवनविक दर्शन संविधान केदर्शन काआर्य: संविधान के दर्शन सेआर्य संविधान मेंउल्लेखनीय देर् के मूल्य ि आदर्ो सेहैजैसेभारतीय संविधान स्वतंत्राता, समानता, लोकतंत्र, समावजक न्याय आवद केवलए प्रवतबद्ध है। इस सबके साथ उसके दर्शन को र्ांवतपूर्शतथा लोकतांवत्रक तरीके सेअमल वकया जाये। भारतीय संविधान में' धमशवनरपेक्षता, अल्प संख्यकोंके अवधकारोंका सम्मान, धवमशक समूहोंके अवधकार सािशभौम मतावधकार, संघिाद आवद का भी समािेर् हुआ हैसंविधान केदर्शन का सिोत्तम सार-संक्षेप संविधान की प्रस्तािना मेंिवर्शत है। संविधान राजनीविक दर्शन का आर्य 1. इसका अवभप्राय यह हैकी संविधान एक कानूनी दस्तािेज होतेहुए भी नैवतक मूल्योंसेजुडा हैl 2. कानून और नैवतक मूल्योंकेबीच गहरा सम्बन्ध हैl इस बात की जानकारी संविधान के राजनीवतक दर्शन सेही ज्ञात होती हैl 3. संविधान मेंव्यिहार वकयेगए पदोंजैसेअवधकार, नागररकता, अल्पसंख्यक अथिा लोकतंत्र के संभावित अथशकी जानकारी या उसमेबदलाि संविधान के राजनीवतक दर्शन केद्वारा ही समझा जा सकता हैl 4. संविधान केबुवनयादी अिधारर्ा को समझनेकेवलए भी इसकी आिश्यकता पडती हैl 5. इसमेंमेंअन्तवनशवहत नैवतक तत्ोंको जाननेकेवलए और उसके दािोंके मुल्यांकन केवलए इसके केप्रवत राजनीवतक दर्शन का नजररया अपनानेकी जरूरत हैl संविधान केराजवनविक दर्शन केलोकिान्त्रिक बदलाि होनेकेकारण वनम्न है- 1. यह सत्ता को वनरंकु र् होनेसेरोकता हैl 2. संविधान बल प्रयोग और दंड र्क्ति पर राज्य केएकावधकार की सीमा तय करता हैl 3. संविधान गहरेसामावजक बदलाि केवलए र्ांवतपूर्शऔर लोकताक्तिक साधन प्रदान करता हैl 4. इस नजररयेमेंसंिैधावनक लोकतंत्र केवसधांत को पूरी तरह सेबदलकर रख देनेकी क्षमता हैl 5. व्यक्ति की स्वतंत्रता 6. संविधान मेंव्यक्तियोंको बहुत सेअवधकार वदए गए हैजो व्यक्तियोंकोआत्म सम्मान केसाथ जीिन व्यतीत करनेमेंसहायक हैl संविधान के अनुसार वनम्न अवधकार व्यक्तिकी स्वतंत्रता को पररभावित करतेहै: • अवभव्यक्ति की स्वतंत्रता • मनमानी वगरफ्तारी केविरुद्ध स्वतंत्रता l
(2) 10 संविधान का राजवनविक दर्शन • प्रेस मेंअपनेविचार रखेकी स्वतंत्रता l भारिीय संविधान की विर्ेषिाएँ: 1. भारतीय संविधान वलक्तखत है। वजसमेंकठोर ि लचीलेपन का वमश्रर् है। 2. भारतीय संविधान विस्तृत संविधान है। 3. भारतीय संविधान संघात्मक संविधान हैवजसमेंएकात्मक र्ासन केलक्षर् विपेहै। 4. भारतीय संविधान मेंप्रस्तािना केसाथ स्वतंत्राता समानता ि लोकतांवत्रक गर्राज्यका समािेर् है| 5. भारतीय संविधान मेंमौवलक अवधकार मौवलक कतशव्य ि राज्यकेनीवत वनदेर्क वसद्धांत' भी वलखे हैआवद। संविधान की आलोचना के वबन्दु: 1. संविधान कसा हुआ दस्तािेज न होकर अस्त व्यस्त है। 2. संविधान मेंसबकी नुमाइंदगी नही हो सकी है। 3. भारतीय पररक्तथथवतयांकेअनुकु ल नही है। 4. संविधान मेंविश्व के अन्य संविधानोंसेउधार वलयेगयेप्रािधन है, अथाशत अन्य देर्ोंकी संविधान से नक़ल की गयी है| भारिीय संविधान केपक्ष मेंिकश: 1. यवद हम इन अलोचनाओंपर विचार करेतो इनमेंबहुत अवधक सत्यता नही ंपातेहैं। इस बात की बहुत संभािना हर संविधान मेंरह सकती हैवक कु ि व्यतव्य ि ब्यौरेसंविधान सेबाहर रह जाये। 2. भारतीय संविधान सभा मेंअवधकतर अगडी जावत सेसंबंवधत सदस्य थेवकं तुविर भी भीमराि अम्बेडकर की जन्मवतवथ को त्यौहार समान बनानेिालेतबकेभी समाज मेंहै| इससेस्पष्ट होता हैं वक संविधान मेंउनकी अनेक आकांक्षाओंकी अवभव्यक्ति हुई है। 3. संविधन वनमाशताओंकेमन मेंपरम्परागत भारतीय ि पविमी मूल्योंकेस्वरूप मेल का भाि था। यह संविधान सचेत चयन का पररर्ाम हैन वक नकल का | 4. इससेएक और महत्पूर्शबात हमारेसंविधान वनमाशताओं की उन गहरी सोंच की वमलती हैवक उन्ोंनेनेदू सरोंकी अच्छाइयोंको भी अपनेसंविधान मेंजगह दी है| भारिीय संविधान की सीमाएँ: भारत का संविधान हर तरह सेपूर्शि त्रुविहीन दस्तािेज है। ऐसा भी नही ंहै। संविधन की कु ि वनम्न सीमाएं है-

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